ये रेशा-रेशा मेरा

यूँ ही ढक लेगा ये तन मेरा कहेगा भी क्या ये रेशा-रेशा मेरा बहुत खूब है इसकी वफ़ाई भी एक बार ठान ले तो अपनाकर ही मानता है शर्माए-शर्माए फ़िरते हैं हम अगर कोई जान गया तो कहेगा भी क्या ये रेशा-रेशा मेरा…

मेरी क़लम

ये कलम आजकल रूठ सी गई है स्याही बिखेरने को कहो तो मेरी ही कहानी कहती है कितनी बार कहा-चुप! नहीं तो दुनिया मुझे जान लेगी लेकिन ये मुझपे उपन्यास लिख रही है पता नहीं क्या मिला इसे मेरी कहानी में जो बेजीझक मुझे भिगा रही है पता नहीं क्या होगा अन्जाम जो-जो ये ज़िदContinue reading “मेरी क़लम”

प्रेरणा

कोई गुज़रा वक़्त होकर भी आज में मौजूद है और कोई लाख कोशिशों के बाद भी आज ही खो गया है… कितना बेचारा है वो जो न तलवार चलाना जाने न कलम… कितने गर्वाभिमानी हैं वो न हालत के आगे झुके न हालातों के आगे… इतना प्रभावित कर जाता है कोई कि चाह कर भीContinue reading “प्रेरणा”