ऐ क़लम! तू क्यूँ मुझे नहीं समझती है…

ऐ कलम! तू क्यूँ रूठती हैवक़्त तो वैसे भी थमा हुआ हैतू क्यूँ साथ छोड़ना चाहती हैएक तू ही हमसफ़र है मेरीतू क्यूँ दगा करना चाहती हैचाहे तो इम्तिहान ले ले मेराबेवज़ह अधम क्यूँ साबित करना चाहती हैमैं तो अभी खड़ी होना सीख रही हूँतू क्यूँ मुझे धूल चटाना चाहती हैऐ कलम! दोस्ती कर लेContinue reading “ऐ क़लम! तू क्यूँ मुझे नहीं समझती है…”