आईना

टूटने-बिखरने को तैयार हूँ बस!कुछ वजहों की तलाश में हूँ मुझे आईने के आगे सिमटना नहीं आता क्यूँकि वो लाचार भी सच के सिवा कुछ नहीं जानता चार-चार बूँद इकट्ठा करके मुट्ठी बंद की थी फ़िर भी उसने चाशनी हथेली में भर हमारे पूरे बदन पर सहलाई थी कितनी निकम्मी है ये कहानी भी तेरीContinue reading “आईना”