मेरी मोहब्बत-फ़कीर

सड़क किनारे सोते देखा

जब अपनी मोहब्बत को

तब रोक नहीं पाया

मैं अपने अश्कों को

ढल गई थी उस लम्हें में मेरी सुबह

जब उसका नाम पुकारते ही

निकली थी दिल से आह

पहला कदम बढ़ाया

जैसे ही उसकी ओर

मेरे भीतर होने लगा

एक अजब-सा शोर

छा रहा था अंधेरा एकदम घोर

साँझ की किरणें ग्रहण लगने लगीं

एक इनकार से

मेरी सुबह ढलने लगी

जैसे ही उससे नज़रें मिलायीं

वो बिना कोई शिकायत किये

आँखों से ओझल हो गयीं

और सड़क पार करके

लोगों के सामने हाथ फ़ैलाके

दिन की रोटी माँगने लगी

आज मेरी मोहब्बत-फ़कीर कहलाने लगी

मेरे दिल की कही

मजबूरियाँ घेर रही हैं

तनहाईयाँ कुबूल रही हैं

सब जाते जा रहे हैं

हम जीते जा रहे हैं

पलटती नहीं

तक़दीर-ए-किताब

कहानियाँ क्यूँ हमें ख़रीद रही हैं

बहकाती हैं कई शामें

लेकिन हमसे तो

हकीकत ही रुबरू हो रही हैं

घूमती हैं इधर-उधर नज़रें

लेकिन धड़कनें

तुम्हीं पर आकर रुक रही हैं

नहीं कर सकते बयाँ अपना इश्क़

तभी दूरियाँ बढ़ रही हैं

मुमकिन नहीं है एक होना

तभी अजनबी कहकर

ये ज़िन्दगी मुकम्मल हो रही हैं

ठेस पहुँचाई हमने तुम्हें

फ़िर भी ये हथेलियाँ

तुम्हारी ख़ैरियत ही माँग रही हैं

हाँ!जानती हूँ

अब ज़रूरत नहीं है इन सबकी

फ़िर भी तुम्हारी खुशियाँ

हमें ज़रूरी लग रही हैं।।

यूँही कागज़ों में छिप-छिपकर साँसें लिया करता है मेरा बेज़ुबान दिल♥️♥️♥️♥️🙂🙂🙂🙂

मेरे लफ़्ज़

कुछ नहीं है अब मेरे पास कहने को

और सब मजबूर किया करते हैं

कुछ तो बोलो…

सम्पूर्ण जीवन सरकस और हम जोकर

इस दुनियादारी से बहुत परे हूँ मैं

इस दुनिया में बेबस-लाचार फिर रही हूँ मैं

चुपचाप रहकर भी चीख़ रही हूँ मैं

डगमग-डगमग होते हैं मेरे क़दम

इस ख़ातिर चलने के लिए खड़ी हूँ मैं

एक बार ख़्वाब पूरे कर लूँ

इस ख़ातिर ना जाने कितनी नींदें तोड़ती हूँ मैं

याद कर सकूँ हर क्षण तुम्हें

इस ख़ातिर ख़ुद को भूल रही हूँ मैं

डूब सकूँ खुशियों में

इस ख़ातिर रोज़ पलकें भिगाती हूँ मैं

कोई मुझसे मेरा नाम न पूछे

इस ख़ातिर नाम कमाने का काम करती हूँ मैं

दुनिया में कुछ बदलाव चाहे

तो लोग कहते हैं

अपने मन की करती हूँ मैं

दीवानी-पगली कहते हैं सब मुझे

पर पूछो तो कभी मुझसे

कैसे-कैसे जी रही हूँ मैं

वैसे तुम क्या जानोगे

बहुत पहले ही मर जो चुकी हूँ मैं।।