मेरी फ़ीकी ज़िन्दगी

इतनी चमक है हर तरफ़

कि हम ही फ़ीके लगने लगे

शुरुआत से शुरू करने की सोचें

तो आरम्भ ही ख़त्म होने लगे

आज सिमटती हुई

बारिश में निकली जब मैं

तो दुनिया ज्वाला उगलने लगी

तन को भिगोए हुए

आँखें बिलखती हुई आँगन में आई

सोचा-अनजाने में सही

कोई आदर की चादर में छिपा लेगा

लेकिन इतनी छींटें थीं तन पर

कि मैंने नयन की बूँदों को छिपा लिया

टहलते-टहलते नींद आई मेरी ओर

तो मैंने थमकर स्वीकार कर लिया

आँचल से पानी टपक रहा था

चूड़ियों से छींटें टकरा रही थीं

ऐसा लगा कुछ क्षण के लिए

नींद;झाड़ू से कीचड़ हटा रही थी

किन्तु तभी गीली चुनरी सिकुड़ने लगी

और जैसे ही

जलमग्न हुई ज़ुल्फ़ें होंठों से टकराईं

अधर की लाली पिघलने लगी

जिस हथेली पर नींद को टिकाया हुआ था

वो थककर डगमगाई

और नींद खुल गई

आईने में देखा ख़ुद को

तो रात की जगमगाहट के आगे

उम्र फ़ीकी लगने लगी…।।

बहुत शिकायतें हैं जीवन में

मगर सुनने वाले हम ख़ुद नहीं

वक़्त बहुत बचा है जीवन में

मगर उम्र जानते हम भी ख़ुद नहीं।।

ऐसा किया करना

मैं बेज़ुबान हो जाऊँ

तो तुम मेरी आवाज़ हो जाना

मैं गुमशुदा हो जाऊँ

तो मेरे इंतज़ार में चौखट ज़रूर तकना

नींद ना आए जब कभी

तो मेरी हथेली को याद ज़रूर करना

संघर्ष भरी है ज़िंदगी

लेकिन वफ़ाई को हमेशा याद रखना

शामें बहुत-सी आएँगी

लेकिन सुबह मुलाकात का ज़िक्र ज़रूर करना

हाथ छुड़ाना मत कभी

जब कभी ज़रूरत हो तो उँगली थाम चल देना

खारिज़ कर दिया तुमने

हमारे इज़हार-ए-मौहब्बत का बयान

लेकिन जब कभी दोस्ती चाहिए हो हमारी

तो हाथ बढ़ाते वक़्त बिल्कुल भी मत हिचकना

मैंने आजकल अंधेरों से नाता जोड़ रखा है

फ़िर भी भानु की परछाई चाहिए हो

तो बस! एक बार याद ज़रूर कर लेना

हाँ!ऊँचाइयों से नाता नहीं रखा कभी

लेकिन जब कभी ग्लानि घेरे

तो हमसे आकर कह देना

जाकर बोल देंगें हिमालय को

ज़रा एक बार पीठ थपथपाकर

हमारे साथी का हौसला बढ़ा देना

विदा तो सब हो ही जाएँगे संसार से

लेकिन हमारी रुख़्सती में

बिल्कुल भी नम मत हो जाना

और फ़िर भी याद आए…

तो पहली मुलाकात को याद कर

मुस्कुरा दिया करना…।।

और फ़िर भी तुम…

ज़रूरत होती है जब तुम्हारी

तब पता नहीं क्यूँ

तनहा कर जाया करते हो

नम हैं मेरी आँखें अभी

और तुम मुस्कुराहट देखना चाहते हो

आज हर तरफ़ से

नोचा जा रहा है मेरे दिल को

खरोचा जा रहा है मेरे ज़ख्मों को

और तुम हमें ज़िन्दा देखना चाहते हो

बहला-फुसलाकर तो जिया करते हैं

और फ़िर भी

तुम ज़िंदगी जीने की वजह पूछते हो

बदलते जा रहे हैं रिश्ते

और तुम हममें बदलाव नहीं चाहते हो

निराला चुटकुला बन गये हैं हम

और फ़िर भी

तुम हमारे साथ खुश नहीं रहते हो

कितनी ही कश्तियों से नैया पार लगाई

और फ़िर भी

तुम बहावों की शिकायत करते हो

जान न्यौछावर कर दी तुम पर

और फ़िर भी

तुम तुम्हारे होने की शर्त रखते हो

ख्याल में बस तुम्हारा ख्याल आता है

और फ़िर भी

तुम हमारा ख्याल तक नहीं करते हो।।

ईश्वरीय सत्ता अटल है

सुन्दर-सुन्दर वादियों में बैठे हो तुम

जब पुकारो तुरन्त ही हाथ थामे

साथ देने चले आते हो तुम

मूरत तुम्हारी पर्वतों में सजी है

लेकिन हमने दिल में उतार

कागज़ों में सिमेट ली है

कपि की भाँति मुख सजा है

दिल चीरकर सियाराम को दिखाया है

हस्त भुजाओं में गदाधारी ने धारण कर

अपने बल से संसार को बचाया है

नाम जपते-जपते बड़ा ही सुकून मिला है

हे श्री राम जी!तुम्हें प्रणाम

तुमने हनुमन्ते नामक भक्त पाया है

मैं गई जब बालाजी महाराज

तो मेरी रूह डरी तो थी

लेकिन बड़ा सहारा मिला

जब अपनों की उँगली थाम

बढ़े ही जा रही थी

जिस-जिस ओर अब देखती

तुम्हारी झलकी पाकर

सुकून से सो जाती

सब शिकायत पता नहीं क्यूँ करते हैं

हर वक़्त तू सोती मिलती है

पर मुझे तो आँखें बंद हो या खुली

तुम्हारे ही दर्शन मिलते हैं

साक्षात प्रकट हो जाओ हे ईश्वर!

ताकि सबको दिखा दूँ

कितनी माया है तुममें

कितनी सच्ची है ये भक्ति की शक्ति

ऐ काल! दर्शन की अभिलाषा है

मैंने अबसे आपको ही हर क्षण

दृढ़ भक्ति से चाहना आरम्भ कर दिया है।।

शान्ति

मैं शान्ति से

कुछ अल्फ़ाज़ व्यक्त करना चाहती हूँ

चीख़-चीखकर हार गई हूँ

मेरी कमी में कमी ढूँढना

आदत हो गई होगी तुम्हारी

शायद इसीलिए

मज़बूत होकर थक गई हूँ

मैंने सारी हिचक को

एक दुपट्टे में बाँधकर ओढ़ लिया है

मैंने आजकल

कल में होकर रहना छोड़ दिया है

फ़िलहाल

मेरी कहानियों को छोड़ो

अपनी कुछ सुनाओ

क्यूँकि अरसे बीत गए

मैंने कुछ नया नहीं कहा है

जब देखो तब

पुराना ही बीता जा रहा है

नया कुछ कहने को

अब बाकी ही क्या रहा है

उन दिनों ख़ामोशी से अवगत नहीं थी मैं

इन दिनों आवाज़ से रूठ गई हूँ मैं

चलो ठीक से हिसाब लगाते हैं

हमारी चुप्पी का

क्यूँकि माहौल बनाकर रख दिया

हमने शान्ति का🤐😑🙏

यूँ ही नहीं आसमानों में कैद होता कोई

बहुत दर्द सहने पड़ते हैं

यूँ ही नहीं शोर में ख़ामोश होता कोई।।

ज़िद ये नहीं है कि पुराने वक़्त में जाना है

आस ये लगी है कि मुझे कहीं तो जाना है

तस्वीर से गुफ्तगू

चुप होकर भी मेरी ज़ुबाँ बोल उठी

सोई तो किस्मत मैं क्यूँ नहीं उठी।

ख़ामोशी से टँगी हुई हूँ इन पथरीली दीवारों पर

पता नहीं क्यूँ ये शिकायत करते हैं न बोलने पर

अजीब कहानी-तेरी ऐ ज़िंदगानी

मेरा जीवन भी कभी हरा-भरा हुआ करता था।वक़्त बदलते ही ये भी पतझड़ हो गया।

मायूस चेहरा कभी हँसते-हँसते दुखता था।आज वो भी दुःख में ही बहता है।

माथा सिकोड़कर नाराज़गी बयाँ कर जाती थी।आज कोने में सिकुड़कर बैठी रहती हूँ।मैं भी कभी ख़ुद को कलाकार समझती थी।आज कठपुतली बन गई हूँ।

मैंने कभी नहीं रखा

मुँह पर कपड़ा

जब भी गलियों में

धूल उड़ा करती थी

क्यूँकि सारी ज़िंदगी

आग में झुलसती रही

अंततः धुँआ-धुँआ होकर

मिट्टी में मिल गई थी

क्या कहने इस ज़िन्दगी के भी

जीते तो मौत से डराती

मरे तो चुप ही हो गई

अपने लिए कभी कुछ बोलती नहीं

अपने आगे कभी बोलने देती नहीं

सुनना तो कभी इसे गँवारा ही नहीं

देखना इसने कभी चाहा नहीं

क्या कहने इस ज़िन्दगी के भी

ना हारने देती

ना जीतने देती

जब भी कुछ करने के लिए बढ़ो

बंदिशों संग पैरों में लटक जाती

अरे!ख़ूब कहने हैं इस ज़िन्दगी के भी

मार तो देती है ही

पर नई कहानी के लिए

लार टपकाना कभी नहीं छोड़ती।।

मेरी मोहब्बत-फ़कीर

सड़क किनारे सोते देखा

जब अपनी मोहब्बत को

तब रोक नहीं पाया

मैं अपने अश्कों को

ढल गई थी उस लम्हें में मेरी सुबह

जब उसका नाम पुकारते ही

निकली थी दिल से आह

पहला कदम बढ़ाया

जैसे ही उसकी ओर

मेरे भीतर होने लगा

एक अजब-सा शोर

छा रहा था अंधेरा एकदम घोर

साँझ की किरणें ग्रहण लगने लगीं

एक इनकार से

मेरी सुबह ढलने लगी

जैसे ही उससे नज़रें मिलायीं

वो बिना कोई शिकायत किये

आँखों से ओझल हो गयीं

और सड़क पार करके

लोगों के सामने हाथ फ़ैलाके

दिन की रोटी माँगने लगी

आज मेरी मोहब्बत-फ़कीर कहलाने लगी

मेरे दिल की कही

मजबूरियाँ घेर रही हैं

तनहाईयाँ कुबूल रही हैं

सब जाते जा रहे हैं

हम जीते जा रहे हैं

पलटती नहीं

तक़दीर-ए-किताब

कहानियाँ क्यूँ हमें ख़रीद रही हैं

बहकाती हैं कई शामें

लेकिन हमसे तो

हकीकत ही रुबरू हो रही हैं

घूमती हैं इधर-उधर नज़रें

लेकिन धड़कनें

तुम्हीं पर आकर रुक रही हैं

नहीं कर सकते बयाँ अपना इश्क़

तभी दूरियाँ बढ़ रही हैं

मुमकिन नहीं है एक होना

तभी अजनबी कहकर

ये ज़िन्दगी मुकम्मल हो रही हैं

ठेस पहुँचाई हमने तुम्हें

फ़िर भी ये हथेलियाँ

तुम्हारी ख़ैरियत ही माँग रही हैं

हाँ!जानती हूँ

अब ज़रूरत नहीं है इन सबकी

फ़िर भी तुम्हारी खुशियाँ

हमें ज़रूरी लग रही हैं।।

यूँही कागज़ों में छिप-छिपकर साँसें लिया करता है मेरा बेज़ुबान दिल♥️♥️♥️♥️🙂🙂🙂🙂