शान्ति

मैं शान्ति से

कुछ अल्फ़ाज़ व्यक्त करना चाहती हूँ

चीख़-चीखकर हार गई हूँ

मेरी कमी में कमी ढूँढना

आदत हो गई होगी तुम्हारी

शायद इसीलिए

मज़बूत होकर थक गई हूँ

मैंने सारी हिचक को

एक दुपट्टे में बाँधकर ओढ़ लिया है

मैंने आजकल

कल में होकर रहना छोड़ दिया है

फ़िलहाल

मेरी कहानियों को छोड़ो

अपनी कुछ सुनाओ

क्यूँकि अरसे बीत गए

मैंने कुछ नया नहीं कहा है

जब देखो तब

पुराना ही बीता जा रहा है

नया कुछ कहने को

अब बाकी ही क्या रहा है

उन दिनों ख़ामोशी से अवगत नहीं थी मैं

इन दिनों आवाज़ से रूठ गई हूँ मैं

चलो ठीक से हिसाब लगाते हैं

हमारी चुप्पी का

क्यूँकि माहौल बनाकर रख दिया

हमने शान्ति का🤐😑🙏

यूँ ही नहीं आसमानों में कैद होता कोई

बहुत दर्द सहने पड़ते हैं

यूँ ही नहीं शोर में ख़ामोश होता कोई।।

ज़िद ये नहीं है कि पुराने वक़्त में जाना है

आस ये लगी है कि मुझे कहीं तो जाना है

तस्वीर से गुफ्तगू

चुप होकर भी मेरी ज़ुबाँ बोल उठी

सोई तो किस्मत मैं क्यूँ नहीं उठी।

ख़ामोशी से टँगी हुई हूँ इन पथरीली दीवारों पर

पता नहीं क्यूँ ये शिकायत करते हैं न बोलने पर

अजीब कहानी-तेरी ऐ ज़िंदगानी

मेरा जीवन भी कभी हरा-भरा हुआ करता था।वक़्त बदलते ही ये भी पतझड़ हो गया।

मायूस चेहरा कभी हँसते-हँसते दुखता था।आज वो भी दुःख में ही बहता है।

माथा सिकोड़कर नाराज़गी बयाँ कर जाती थी।आज कोने में सिकुड़कर बैठी रहती हूँ।मैं भी कभी ख़ुद को कलाकार समझती थी।आज कठपुतली बन गई हूँ।

मैंने कभी नहीं रखा

मुँह पर कपड़ा

जब भी गलियों में

धूल उड़ा करती थी

क्यूँकि सारी ज़िंदगी

आग में झुलसती रही

अंततः धुँआ-धुँआ होकर

मिट्टी में मिल गई थी

क्या कहने इस ज़िन्दगी के भी

जीते तो मौत से डराती

मरे तो चुप ही हो गई

अपने लिए कभी कुछ बोलती नहीं

अपने आगे कभी बोलने देती नहीं

सुनना तो कभी इसे गँवारा ही नहीं

देखना इसने कभी चाहा नहीं

क्या कहने इस ज़िन्दगी के भी

ना हारने देती

ना जीतने देती

जब भी कुछ करने के लिए बढ़ो

बंदिशों संग पैरों में लटक जाती

अरे!ख़ूब कहने हैं इस ज़िन्दगी के भी

मार तो देती है ही

पर नई कहानी के लिए

लार टपकाना कभी नहीं छोड़ती।।

मेरी मोहब्बत-फ़कीर

सड़क किनारे सोते देखा

जब अपनी मोहब्बत को

तब रोक नहीं पाया

मैं अपने अश्कों को

ढल गई थी उस लम्हें में मेरी सुबह

जब उसका नाम पुकारते ही

निकली थी दिल से आह

पहला कदम बढ़ाया

जैसे ही उसकी ओर

मेरे भीतर होने लगा

एक अजब-सा शोर

छा रहा था अंधेरा एकदम घोर

साँझ की किरणें ग्रहण लगने लगीं

एक इनकार से

मेरी सुबह ढलने लगी

जैसे ही उससे नज़रें मिलायीं

वो बिना कोई शिकायत किये

आँखों से ओझल हो गयीं

और सड़क पार करके

लोगों के सामने हाथ फ़ैलाके

दिन की रोटी माँगने लगी

आज मेरी मोहब्बत-फ़कीर कहलाने लगी

मेरे दिल की कही

मजबूरियाँ घेर रही हैं

तनहाईयाँ कुबूल रही हैं

सब जाते जा रहे हैं

हम जीते जा रहे हैं

पलटती नहीं

तक़दीर-ए-किताब

कहानियाँ क्यूँ हमें ख़रीद रही हैं

बहकाती हैं कई शामें

लेकिन हमसे तो

हकीकत ही रुबरू हो रही हैं

घूमती हैं इधर-उधर नज़रें

लेकिन धड़कनें

तुम्हीं पर आकर रुक रही हैं

नहीं कर सकते बयाँ अपना इश्क़

तभी दूरियाँ बढ़ रही हैं

मुमकिन नहीं है एक होना

तभी अजनबी कहकर

ये ज़िन्दगी मुकम्मल हो रही हैं

ठेस पहुँचाई हमने तुम्हें

फ़िर भी ये हथेलियाँ

तुम्हारी ख़ैरियत ही माँग रही हैं

हाँ!जानती हूँ

अब ज़रूरत नहीं है इन सबकी

फ़िर भी तुम्हारी खुशियाँ

हमें ज़रूरी लग रही हैं।।

यूँही कागज़ों में छिप-छिपकर साँसें लिया करता है मेरा बेज़ुबान दिल♥️♥️♥️♥️🙂🙂🙂🙂

मेरे लफ़्ज़

कुछ नहीं है अब मेरे पास कहने को

और सब मजबूर किया करते हैं

कुछ तो बोलो…

सम्पूर्ण जीवन सरकस और हम जोकर

इस दुनियादारी से बहुत परे हूँ मैं

इस दुनिया में बेबस-लाचार फिर रही हूँ मैं

चुपचाप रहकर भी चीख़ रही हूँ मैं

डगमग-डगमग होते हैं मेरे क़दम

इस ख़ातिर चलने के लिए खड़ी हूँ मैं

एक बार ख़्वाब पूरे कर लूँ

इस ख़ातिर ना जाने कितनी नींदें तोड़ती हूँ मैं

याद कर सकूँ हर क्षण तुम्हें

इस ख़ातिर ख़ुद को भूल रही हूँ मैं

डूब सकूँ खुशियों में

इस ख़ातिर रोज़ पलकें भिगाती हूँ मैं

कोई मुझसे मेरा नाम न पूछे

इस ख़ातिर नाम कमाने का काम करती हूँ मैं

दुनिया में कुछ बदलाव चाहे

तो लोग कहते हैं

अपने मन की करती हूँ मैं

दीवानी-पगली कहते हैं सब मुझे

पर पूछो तो कभी मुझसे

कैसे-कैसे जी रही हूँ मैं

वैसे तुम क्या जानोगे

बहुत पहले ही मर जो चुकी हूँ मैं।।