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जब भी कभी

जब भी कभी क़दम बढ़ाओ

तो उसे रोको मत

जब भी कभी मुस्कुराओ

तो रोना मत

जब भी कभी मिलो

तो बिछड़ना मत

जब भी कभी हाथ बढ़ाओ

तो पीछे हटना मत

जब भी कभी पुकारो

तो ख़ामोश होना मत

जब भी कभी कुछ न समझो

तो परेशान होना मत

जब भी कभी किसी को पाओ

तो उसे खोना मत

जब भी कभी नई सुबह हो

तो अंधेरा करना मत

जब भी कभी ज़िन्दगी शुरू हो

तो उसे ख़त्म करना मत

जब भी कभी आज को देखो

तो कल की फ़िक्र करना मत

जब भी कभी अकेले पड़ जाओ

तो कमज़ोर पड़ना मत

जब भी कभी ख़ुद को समझो

तो दूसरों को ठुकराना मत

जब भी कभी ऐसा हो तो…।।

महक

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तुम्हारे प्रेम में मोहन

अंग-अंग महक उठा

तुम्हारी लीला से मोहन

सारा ब्रह्मांड खिल उठा

बंसी बजाई जो तुमने

रैन-बसेरा जाग उठा

साँझ अभी हुई ही थी

कि इन थिरकनों से

शोर मच उठा

देखो वो आया कन्हैया

यमुना तीरे गोपियों के दिल में

रासलीला का अरमान जाग उठा

मोर पंख सजाए जो आया

उसे देख हर फूल सुगन्धित हो उठा

जाने कौन है ये जादूगर

आते-जाते सबको रिझा उठा।

दिवाली

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अपने धाम लौटे राम

सजे गाम पुकारे राम

जय श्री राम!

जय श्री राम!

राम जियें धर्म जिये

ऐसे कितने वचन हुए

राम लौटे लक्ष्मण लौटे

सिया आईं उर्मिला मुस्काई

मिली बहनें मिले भाई

ये देख नगरी-मैया प्रफुल्लाईं

गुरु भी ख़ूब गर्वित हुए

आशीष भी खुशी से दिए

और हनुमान-अंगद-भीभीषण आए

संग सुग्रीव-जामवंत-नल-नील हर्षाए

देखो!देखो!

दुल्हन की तरह सजाई अयोध्या

आगमन पर सारा जहाँ जगमगाया

दिये जले रंगोली बनी

धूमधाम से दिवाली मनी।

Happy Diwali 🤗🤗

दिवाली की आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ🙏🙏

मुझे गुनगुनाना है

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इस बेरहम दुनिया की अशांति से

कुछ पल के लिए दूर हो जाते हैं

कितनी भीड़ है यहाँ

चलो अपने वजूद को ढूँढे

ज्यादा दूर नहीं जाना है

बस अपने दिल में झाँक

कुछ सुरों में खो जाना है

फिर देर किस बात की

मुझे तो अभी कुछ गुनगुनाना है।

डरती हूँ कहीं ये जहान

मेरा ज़हन न पढ़ ले

कितनी बातें छुपाई

कहीं उनसे न कह दे

अफ़सोस होता है हर क्षण

कि मुझे हँसना बहुत आता है

क्या से क्या हो गए

ये पिछले दिनों ही जाना है

अरे यार! मत बुलाओ

अब तो मुझे अपने लिए चलना है

कभी कलियों में

कभी कागज़ों में महकना है

लेकिन टहलते-थकते

कुछ न कुछ तो कर गुज़रना है

बहुत वक़्त से शांत हूँ

अब अपने लिए दहाड़ना है

सिंह हूँ मैं

तो बिल्ली नहीं शेरनी बनना है😎

मुझे भी अब गुनगुनाना है

गुनगुनाना है…

अल्फ़ाज़ बड़े या ज़ुबाँ

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ये दिल कहीं रुकता नहीं

ये वक़्त कहीं ठहरता नहीं

मुझको शिकायत है उससे

जो मेरा होकर भी होता नहीं।

नदियों में गोते लगाती मछलियाँ

हर आँगन को मैला करती नहीं

यूँ ही बदनाम मत करो इन्हें

ये हर किनारे तक पहुँचती नहीं।

चारदीवारियों से झाँकने वाला

हर कोई कैदी होता नहीं

हम पर बंदिशें लगाने वाला

हर कोई कोतवाल होता नहीं।

सुनना चाहो तो कभी सुनना

हर अंधेरा ख़ामोश होता नहीं

ढूँढना चाहो तो ढूँढ लेना

ऐसी कोई रात नहीं

जिसका सवेरा होता नहीं।

हँसता हुआ चेहरा

कभी हँसा था ही नहीं

लाख छुपा लो सच्चाई को

सच छिपाए छिपता नहीं।

ये दुनियादारी कभी समझ आती नहीं

जो समझा वो हक़ीक़त होती नहीं

बहलाते हुए कई लोग मिलेंगें

पग-पग पर

राह पर अडिग रहने का

रास्ता कोई दिखाएगा ही नहीं।

मैं चुपचाप कह दूँगी मन की बातें

लेकिन कोई सुनेगा भी या नहीं।

फ़ोन और बचपन

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बचपन में इस ट्रिंग-ट्रिंग की कहाँ समझ थी

बचपन में इस दूरी की कहाँ ज़्यादा बूझ थी

बस!जो पास उससे खुश हो जाते थे

बस!जितना मिला उसे ही पर्याप्त मानते थे

अब समझ आया बड़े लोग

तब बचपन क्यूँ माँगते थे

जब हम बच्चे हुआ करते थे

क्यूँकि उस ज़माने को

हम भी कई दिनों से तरस रहे थे

कैसे-कैसे और जाने कहाँ गए वो दिन

उन्हें देखने को एल्बम तलाश रहे थे

और कहीं ये वक़्त गुज़र न जाए

तो उन्हें खूबसूरत यादों में कैद कर रहे थे

लेकिन कमी रही तो वहाँ

दिल में झाँकना भूले जहाँ

क्यूँकि हमारे इर्द-गिर्द

कितने ही बच्चे घूम रहे थे

लेकिन उसमें ख़ुद को नहीं देख पाए थे

शायद!इसीलिए वक़्त से पहले ही

बहुत ज़्यादा बड़े हो गए थे

और आजकल तो अपनों से

फ़ोन पर ही मुलाकात होती है

पता ही नहीं चला बड़े से बड़े

और छोटे से छोटे की ज़िंदगी

एक चलभाष पर कैसे-कब-कहाँ और क्यूँ

पूर्णतः निर्भर हो जाया करती है

भले ही बहुत कुछ पाया है

कितना कुछ खोया है

लेकिन साथ ही साथ

फ़ोन की सुविधा से

बहुत कुछ आसान हो गया है

और जीवन का सफ़र भी

काफ़ी मनोरंजक हो गया है।