ऐ क़लम! तू क्यूँ मुझे नहीं समझती है…

ऐ कलम! तू क्यूँ रूठती है
वक़्त तो वैसे भी थमा हुआ है
तू क्यूँ साथ छोड़ना चाहती है
एक तू ही हमसफ़र है मेरी
तू क्यूँ दगा करना चाहती है
चाहे तो इम्तिहान ले ले मेरा
बेवज़ह अधम क्यूँ साबित करना चाहती है
मैं तो अभी खड़ी होना सीख रही हूँ
तू क्यूँ मुझे धूल चटाना चाहती है
ऐ कलम! दोस्ती कर ले मुझसे
तू क्यूँ मुझे तनहाई में डुबोना चाहती है
तू ठहरी रंगीन स्याही
मैं ठहरी कोरा कागज़
क्या है ऐसा तुझमें
जो गुमान में लहराया करती है
देख!वादा ले ले मुझसे
रंग बदलना मैं भी सीख लूँगी
अरे! अरे! जाती कहाँ है
चाहे तो मेरे अश्क़ का रंग पूछ ले
कुछ गलत कहा क्या मैंने
जो इतना ज़ोर-ज़ोर से हँसती है
ऐ कलम! तू क्यूँ मुझे नहीं समझती है।।

कोई और रास्ता है भी नहीं

कला और कलाकार की

अंधाधुंध मौत के काफ़िले में

हम कुछ यूँ जिये जा रहे हैं

सब हमसे मिलना चाह रहे हैं

हम भेस बदलते जा रहे हैं।।

क्यूँ कोई चला जाता है

बताकर जाने वाला लौटकर ज़रूर आता है

लेकिन जाने वाला नज़र नहीं आता है

जाने कहाँ वो गुम हो जाता है

कि ढूँढने पर भी नज़र नहीं आता है।

आख़िर यूँ ही क्यूँ…

यूँ ही कह जायेगा कोई

अपनी मनमानी समझ के

यूँ ही सह जायेगा कोई

अपनी क़िस्मत समझ के

और आख़िर में…

होगा भी तो होगा क्या

यूँ ही मार देगा कोई

ख़ुद को काल समझ के

साथ ही…

यूँ ही मर जायेगा कोई

ख़ुद को मृत समझ के।।