वो शख़्स

काश! वो झप्पी मेरे दर्द

आज फ़िर से छिपा ले

मैं जिस शख़्स को

रोज़ चीख़-चीख़कर

पुकारा करती हूँ

आज वो मुझे बुला ले।

क्यूँ कोई चला जाता है

बताकर जाने वाला लौटकर ज़रूर आता है

लेकिन जाने वाला नज़र नहीं आता है

जाने कहाँ वो गुम हो जाता है

कि ढूँढने पर भी नज़र नहीं आता है।

आख़िर यूँ ही क्यूँ…

यूँ ही कह जायेगा कोई

अपनी मनमानी समझ के

यूँ ही सह जायेगा कोई

अपनी क़िस्मत समझ के

और आख़िर में…

होगा भी तो होगा क्या

यूँ ही मार देगा कोई

ख़ुद को काल समझ के

साथ ही…

यूँ ही मर जायेगा कोई

ख़ुद को मृत समझ के।।