मेरी दूसरी पुस्तक

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कोई और रास्ता है भी नहीं

कला और कलाकार की अंधाधुंध मौत के काफ़िले में हम कुछ यूँ जिये जा रहे हैं सब हमसे मिलना चाह रहे हैं हम भेस बदलते जा रहे हैं।।

क्यूँ कोई चला जाता है

बताकर जाने वाला लौटकर ज़रूर आता है लेकिन जाने वाला नज़र नहीं आता है जाने कहाँ वो गुम हो जाता है कि ढूँढने पर भी नज़र नहीं आता है।

आख़िर यूँ ही क्यूँ…

यूँ ही कह जायेगा कोई अपनी मनमानी समझ के यूँ ही सह जायेगा कोई अपनी क़िस्मत समझ के और आख़िर में… होगा भी तो होगा क्या यूँ ही मार देगा कोई ख़ुद को काल समझ के साथ ही… यूँ ही मर जायेगा कोई ख़ुद को मृत समझ के।।