अजीब कहानी-तेरी ऐ ज़िंदगानी

मेरा जीवन भी कभी हरा-भरा हुआ करता था।वक़्त बदलते ही ये भी पतझड़ हो गया।

मायूस चेहरा कभी हँसते-हँसते दुखता था।आज वो भी दुःख में ही बहता है।

माथा सिकोड़कर नाराज़गी बयाँ कर जाती थी।आज कोने में सिकुड़कर बैठी रहती हूँ।मैं भी कभी ख़ुद को कलाकार समझती थी।आज कठपुतली बन गई हूँ।

मैंने कभी नहीं रखा

मुँह पर कपड़ा

जब भी गलियों में

धूल उड़ा करती थी

क्यूँकि सारी ज़िंदगी

आग में झुलसती रही

अंततः धुँआ-धुँआ होकर

मिट्टी में मिल गई थी

क्या कहने इस ज़िन्दगी के भी

जीते तो मौत से डराती

मरे तो चुप ही हो गई

अपने लिए कभी कुछ बोलती नहीं

अपने आगे कभी बोलने देती नहीं

सुनना तो कभी इसे गँवारा ही नहीं

देखना इसने कभी चाहा नहीं

क्या कहने इस ज़िन्दगी के भी

ना हारने देती

ना जीतने देती

जब भी कुछ करने के लिए बढ़ो

बंदिशों संग पैरों में लटक जाती

अरे!ख़ूब कहने हैं इस ज़िन्दगी के भी

मार तो देती है ही

पर नई कहानी के लिए

लार टपकाना कभी नहीं छोड़ती।।

Published by Ps Pooja

Writing is my passion.

6 thoughts on “अजीब कहानी-तेरी ऐ ज़िंदगानी

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